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Azamgarh: सुपरस्टार से सांसद बने निरहुआ के एक साल पूरे

 

Azamgarh: मार्च 2019 मे हमलोग बनारस मे शूटिंग कर रहे थे, फ़िल्म का नाम था " ठीक है ", लोकसभा चुनाव की तैयारी चरम पर थी, भोजपुरी फिल्मो के जुबली स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ़ निरहुआ ने भी चुनाव लड़ने का मन बना लिया था और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनकी इसी मुद्दे पर तीन बार मुलाक़ात भी हो चुकी थी। 4 अप्रैल को योगी जी बनारस आये तो सर्किट हाउस मे निरहुआ जी को बुलाया, मैं भी उनके साथ था। मात्र 5 मिनट की मीटिंग हुई और योगी जी ने चुनाव की तैयारी का फरमान सुना दिया योगी जी की मंशा थी की निरहुआ आजमगढ़ से अखिलेश यादव के खिलाफ चुनाव लड़े।  निरहुआ ने भी अपनी सहमति दे दी थी, बस नाम की घोषणा होना बाकी थी 7 अप्रैल को नाम की घोषणा हो गई और 8 अप्रैल को निरहुआ जी, अलोक कुमार जी, प्रवेश लाल जी, मै और संतोष पहलवान जी सुबह सुबह बनारस से आजमगढ़ के लिए निकल पड़े। 

 

पहले निरहुआ जी के गांव टांड़वा पहुचे हम लोग, बनारस से 6 की संख्या मे हमलोग निकले थे और गांव से जब हम निकले तब यह संख्या डेढ़ दो सौ के करीब पहुंच चुकी थी, फिर हमारा काफिला टांड़वा से आजमगढ़ के लिए निकला तो लोगो की भीड़ और गाड़ियों की संख्या बढ़ती गई, बनारस से मात्र 3 गाड़ियों से शुरू हुआ हमारा सफर छोटी बड़ी 3 हजार गाड़ियों मे बदल गया था और 6 की संख्या भारी भीड़ मे एक महीने तक जोश के साथ हम सबने चुनाव प्रचार किया लेकिन हम असफल रहे। बसपा सपा गठबंधन को जीत हासिल हुई.. निरहुआ जी की कर्मठता ही थी की आजमगढ़ से मात्र नामांकन भरकर जीत हासिल करती आई सपा ने इस चुनाव मे काफ़ी मेहनत की, खुद अखिलेश यादव जी की धर्मपत्नी डिम्पल यादव, भाई धर्मेन्द्र यादव आखिरी दिनों मे काफ़ी सक्रिय रहे। 

 

नतीजा ये हुआ की डिम्पल यादव और धर्मेंद्र यादव ने आजमगढ़ तो जीता दिया पर दोनों चुनाव हार गए, खैर निरहुआ जी हार तो गए लेकिन उनको वहां से जितने वोट मिले उतना वोट 2014 मे जीत हासिल करने वाले मुलायम सिंह यादव को भी नहीं मिला था और अगर सपा बसपा गठबंधन नहीं हुआ होता तो जीत निरहुआ की होती निरहुआ हार से हताश तो हुए लेकिन उन्होंने हौसला नहीं खोया और आजमगढ़ से जुड़े रहे.. यहाँ तक की उनको काम करते देख लोगो को लगने लगा की सांसद तो निरहुआ को ही होना चाहिए था फिर 3 साल बाद आ गया उत्तरप्रदेश का विधानसभा चुनाव। आजमगढ़ के सांसद अखिलेश यादव मान के चल रहे थे की सपा सत्ता मे आएगी पर उत्तरप्रदेश की जनता ने उनके सत्ता मे आने के सपने को तोड़ दिया अखिलेश जी विधानसभा चुनाव जीत कर आ गए थे और उन्होंने विधानसभा मे ही रहने का मन बनाया और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। 

 

तीन साल के अपने कार्यकाल मे अखिलेश यादव मात्र दो बार आजमगढ़ आये थे वो भी निजी कार्यक्रम मे जबकि निरहुआ वहां के हर राजनितिक और सामजिक कार्यक्रम मे भाग लेते थे, लोगो का भरोसा उनके प्रति बनने लगा था उपचुनाव की घोषणा हो गई की 23 जून को मतदान और 26 जून को परिणाम घोषित होंगे। अखिलेश यादव ने 2019 मे हारे अपने भाई धर्मेन्द्र यादव को मैदान मे उतारा और चार जून को निरहुआ जी के नाम की घोषणा हुई 6 जून को निरहुआ जी ने नामांकन पत्र भरा और जुट गए प्रचार मे समय कम था, लेकिन जोश और ज़ज्बा उफान पर था।  23 जून को मतदान के बाद यह साफ हो गया था की हम जीत रहे हैं मनोज टाइगर जी, संजय पांडे जी, अयाज़ खान जी, सुशील सिंह जी, प्रवेश जी, आम्रपाली जी, नीलम गिरी जी सहित ग्लैमर जगत के कई लोग मेहनत कर रहे थे। कई लोग अप्रत्यक्ष रूप से बिना फ्रेम मे आये चुनाव प्रचार मे लगे थे, फिर आया 26 जून मतगणना शुरू हुई सांप सीढ़ी का खेल चलता रहा और अंततः जीत निरहुआ जी की हुई  समजवादी किला ढह चुका था और मुश्किल लग रहा काम आसान हो गया था। 

 

आज एक साल हो गए इस एक साल मे निरहुआ ने जितना समय आजमगढ़ मे दिया, जितना काम आजमगढ़ मे कराया, जितना वे लोगो से मिले उतना शायद ही आजमगढ़ के किसी नेता ने किया होगा शूटिंग के दौरान हो या ऐसे भी रोजाना सैकड़ो लोग निरहुआ जी से मिलने आते थे और जो भी जैसा भी काम लेकर आया निराश नहीं हुआ। हकीकत तो यह हैँ की निरहुआ जी और उनकी टीम के लोग हमेशा आम लोगो की समस्याओ को लेकर जागरूक रहते हैं। निरहुआ जितनी आसानी से उनके लिए उपलब्ध है उतना तो कोई विधायक नहीं रहता निरहुआ जी और उनकी टीम को बधाई। 

 

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